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मनुष्य की सभी समस्याओं की जड़ उसका अपना मन होता है - पूज्य प्रेमभूषण जी महाराज

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संवाददाता।लखनऊ 
मानस जी के आश्रय में आज की कथा में आप यह जानें कि आप कौन हैं? हर मनुष्य वही होता है जो उसका मन होता है। लाख बना श्रृंगार कर ले लेकिन अगर मन दूषित है तो हम भी वही हैं। मन को विषयों में रस मिलता है तो हम विषयी हैं। अगर हमने अपने मन को नहीं संवारा तो हमारा पूरा जीवन बेकार है।
कविकुल चूड़ामणि पूज्य तुलसीदास जी महाराज ने मन को हाथी की संज्ञा दी है। ऐसा मनमौजी जीव जिसका पेट भरा भी हो तो भी अगल-बगल के झाड़ को उखाड़ते चलता है। यह जीव अर्थात हाथी रूपी मन सत्संग के सरोवर में जाकर के ही शांत हो पाता है। मन पर इंद्रियों का प्रभाव हमारे आहार और विहार के कारण हमारे व्यवहार के रूप में सामने आता है। मन सदा इंद्रियों के वश में होकर विषयों में सुख ढूंढता फिरता है।
सरस् श्रीराम कथा गायन के लिए सर्वप्रिय प्रेममूर्ति पूज्य श्री प्रेमभूषण जी महाराज ने उक्त बातें लखनऊ के गोमती नगर विस्तार स्थित सीएमएस विद्यालय के मैदान में ममता चैरिटेबल ट्रस्ट की तत्वाधान में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के सातवें दिन व्यासपीठ से कथा वाचन करते हुए कहीं।
श्री रामकथा गायन के माध्यम से भारतीय और पूरी दुनिया के सनातन समाज में अलख जगाने के लिए जनप्रिय कथावाचक प्रेमभूषण जी महाराज ने भगवान के वन प्रदेश की मंगलयात्रा प्रसंग का गायन करते हुए कहा कि अगर हमें अपने मन को निर्मल बनाना है तो हमें अपना आहार और विहार दोनों पहले शुद्ध करने की आवश्यकता होगी।
जीवन में कुछ भी विशेष करना हो तो पहले हमें अपने मन - मस्तिष्क को इसके लिए व्यवस्थित करके तैयारी करनी होती है। राम कथा जीव को धन्य-धन्य बनाती है, मन को भगवान में लगती है और विषयों से दूर ले जाती है।
पूज्य श्री ने कहा कि अगर हम सहज रहना चाहते हैं और सहज जीना चाहते हैं तो हमारे पास इस कलियुग के मल को काटने और धोने का एकमात्र साधन है श्री राम कथा। काम, क्रोध,लोभ, मद और मत्सर आदि विकार कलिमल कहे जाते हैं। इससे बचने का एकमात्र सहज साधन श्री राम कथा ही है। मानस जी में लिखा है इस कथा को जो सुनेगा, कहेगा और गाएगा वह सब प्रकार के सुखों को प्राप्त करते हुए अंत में प्रभु श्री राम के धाम को भी जा सकता है।
पूज्यश्री ने कहा कि जब मन पर कलिमल का प्रभाव हो तो
चाह कर भी मनुष्य सत्कर्म के पथ पर आगे नहीं बढ़ पाता है। मनुष्य का मन और उसके बुद्धि उसके अपने कर्मों के अधीन है। हम जो भी कम करते हैं उसे हमारा क्रियमाण बनता है। यही कर्म फल एकत्र होकर संचित कर्म होता है और फिर कई जन्मों के लिए यह प्रारूप प्रारब्ध के रूप में जीव के साथ जुड़ जाता है। सत्कर्मों से जिसने भी अपने प्रारब्ध को बेहतर बना रखा है, इस जन्म में भी सत्कर्मों में उसी की गति बन पाती है । अन्यथा बार-बार विचार करने के बाद भी हम उस पथ पर अपने को आगे नहीं ले जा पाते हैं।
 जीवन में सुख और शांति की अपेक्षा है तो घर में सत्संग का वातावरण बनाया जाय। घर में सत्संग का वातावरण होगा तो अगली पीढ़ी के बच्चों में वह अवतरित होगा। बच्चे कुसंगति को बहुत जल्दी अंगीकार करते हैं। अगर उन्हें कल कुसंगति से बचाना है तो उन्हें निरंतर सत्संग में गति करानी होगी।
*कोई जाति नहीं होती है भगत की*
 मनुष्य मात्र की दिमागी कसरत है जाति-पाती के भेद। भगवान ने कभी भी, कहीं भी जात-पात भेद को बढ़ावा देने की बात नहीं करी है। श्रीरामचरितमानस में इस बात का बार-बार प्रमाण आया है। भगवान ने केवट जी, शबरी जी और निषाद जी को जो सौभाग्य प्रदान किया वह अपने आप में यह बताने के लिए पर्याप्त है कि भगवान कभी भी भगत में जात-पात का भेद नहीं देखना चाहते हैं।
 महाराज जी ने श्री राम कथा गायन के क्रम में केवट प्रसंग के बाद के कथा प्रसंगों का गायन करते हुए कहा कि देश में जाति पाती का झगड़ा झमेला राजनीतिक दलों की देन है। पूज्यश्री ने कहा कि अगर हमें जीवन का आनंद लेना है तो हमें जीवन को उत्सव में बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। श्रेष्ठ व्यक्ति जहां पहुंच जाता है वहां ही उत्सव का माहौल बन जाता है।
महाराज श्री ने कहा कि भारत की भूमि देवभूमि है, धर्म की भूमि है । यहां धर्म का पालन करने वाले ही सदा सुखी रहते हैं और अधर्म पथ पर चलने वाले लोगों को दुख भोगने ही पड़ते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में सनातन धर्म और परंपरा के साथ कई तरह के खिलवाड़ की घटनाएं हो रही है जो चिंता का विषय है।
हमारी संस्कृति धर्म पर आधारित है जैसे तैसे नहीं चलती है। धर्म और परंपराओं का सब विधि से पालन होना चाहिए और तभी समाज का कल्याण संभव है।
भरत चरित्र सुनाते हुए महाराज श्री ने कहा कि लोग इस समय राम राज्य की स्थापना की बात कर रहे हैं और मैं भी भारत में राम राज्य की स्थापना के पक्ष में हूं। जरूर रामराज की स्थापना होनी चाहिए। लेकिन, सबसे पहले यह हमारे अपने घरों में होनी चाहिए। जब हम स्वयं सदग्रंथों के आश्रय में धर्म आचरण करते हुए जीवन जिएंगे तो हमारे खुद के भीतर और परिवार में राम राज्य की स्थापना होगी तो समाज में भी रामराज की स्थापना होगी।
 महाराज श्री ने कहा कि मनुष्य अपने परिवार के लोगों के लिए ही जीवन में गलत कार्य करता है धन उपार्जन करने के लिए। लेकिन उसे यह सोचने की आवश्यकता होती है कि कोई इसके फल में उसका साथ देने वाला नहीं है फल तो उसको स्वयं अकेले ही खाना पड़ता है।
 बेईमानी का संग्रह टिकता नहीं है और ना ही उससे जीवन में कोई सुखी हो पाता है। अगर मनुष्य को जीवन में सुख चाहिए तो वह उसे सिर्फ अपने सत्कर्म से ही प्राप्त हो सकता है। अपने परिश्रम से अर्जित धन से जो व्यक्ति अपना जीवन व्यतीत करता है वही सुखी रह पाता है।
भरत चरित्र और अन्य प्रसंगों का श्रवण करने के लिय बड़ी संख्या में उपस्थित श्रोतागण को महाराज जी के द्वारा गाए गए दर्जनों भजनों पर झूमते हुए देखा गया। अतिथि के रूप मे प्रदेश अध्यक्ष किसान मोर्चा, कामेश्वर सिंह,दिव्य प्रेम सेवा मिशन प्रमुख आशीष गौतम,पीजीआई निदेशक आरके धीमान, आई .जी .आर के राठौर,आई. ए. एस. अमित सिंह, नामित टण्डन,परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह,अमित सिंह सचिव, मुख्यमंत्री ,आई .ए. एस. राजशेखर ,चिकित्सक डॉ आनंद प्रकाश,मत्स्य पालन मंत्री डॉ संजय निषाद,विधान परिषद सदस्य अवनीश सिंह पटेल,आईएएस अजय सिंह विशेष सचिव मुख्यमंत्री,दीपक अग्रवाल सहित अनेक समाजसेवी,प्रशासनिक अधिकारी शिक्षाविद उपस्थित रहे सभी ने महराज जी से आशिर्वाद प्राप्त कर ममता चैरिटेबल ट्रस्ट परिवार एवं मुखिया राजीव मिश्रा के प्रयासों की खूब सराहना किया!

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